🇮🇳 आष्टा | अव्यवस्था, पक्षपात और सवालों के बीच मना 77वां गणतंत्र दिवस
देश का 77वां गणतंत्र दिवस आष्टा नगर सहित आसपास के ग्रामीण अंचलों में पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। शासकीय एवं अशासकीय संस्थानों में ध्वजारोहण हुआ, देशभक्ति के संदेश गूंजे और बच्चों की प्रस्तुतियों ने माहौल को जीवंत बनाया।
शहर का मुख्य समारोह श्यामा प्रसाद मुखर्जी मैदान में आयोजित किया गया, जहां जनपद अध्यक्ष श्रीमती दीक्षा सोनू गुणवान द्वारा ध्वजारोहण कर मुख्यमंत्री के संदेश का वाचन किया गया। इसके पश्चात सांस्कृतिक कार्यक्रमों की प्रस्तुतियां हुईं। तथा परंपरा अनुसार अनाज मंडी व्यापारी संघ द्वारा कृषि उपज मंडी परिसर में बच्चों को मिठाइयों का वितरण किया गया।
लेकिन…
राष्ट्रीय पर्व की गरिमा के बीच जो सबसे ज्यादा नजर आया, वह थी अव्यवस्था, लापरवाही और विवाद।
* मंच सजा, पर व्यवस्था बिखरी*

जिस तरह मंच पर भीड़ ठूंसी हुई नजर आई, उसी तरह मंच के नीचे की बैठक व्यवस्था जिम्मेदारों की कर्तव्यहीनता का प्रमाण बन गई। हालात ऐसे रहे कि आमंत्रित पत्रकारगण पूरे कार्यक्रम के दौरान खड़े रहने को मजबूर रहे—जो आयोजन की गंभीरता पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। वही मुख्य मैदान पर कार्यक्रम को लेकर जिम्मेदार कितने सजक थे, इसकी बानगी एक गाय हे जो कार्यक्रम के दौरान बीच मैदान पर विचरण करती नजर आई।
सांस्कृतिक कार्यक्रम या चयनित प्रदर्शन?

सूत्रों के अनुसार, सांस्कृतिक कार्यक्रमों को लेकर इस बार भी वही हुआ, जिसकी आशंका निजी विद्यालयों को पहले से थी।
शहर में बड़ी संख्या में निजी विद्यालय संचालित होने के बावजूद इस वर्ष केवल 3 प्राइवेट और 4 शासकीय स्कूलों ने सांस्कृतिक प्रोग्राम में अपनी भागीदारी दी। स्कूलों की अनुपस्थिति को लेकर निजी विद्यालय संचालकों का आरोप है कि हर वर्ष हमारे साथ पक्षपात होता हे, ओर इस बार जिन निजी शिक्षण संस्थानों ने हिस्सा लिया वे भी अब आरोप लगाते नजर आए कि इस बार भी उनके साथ पक्षपात किया गया।
*🏆 जब पुरस्कार लेने से किया इनकार*
कार्यक्रम के अंत में स्थिति तब और गंभीर हो गई जब मार्टिनेट हायर सेकेंडरी स्कूल, अलीपुर ने निर्णायक मंडल के निर्णय पर सवाल उठाते हुए पुरस्कार लेने से इनकार कर दिया।
स्कूल प्रबंधन का कहना था कि सभी विद्यालयों को प्रस्तुति के लिए 10-10 मिनट का समय निर्धारित था, लेकिन शासकीय सांदीपनि विद्यालय ने 13 मिनट 37 सेकेंड तक प्रस्तुति दी—जो नियमों का सीधा उल्लंघन था।
इसके बावजूद निर्णायक मंडल ने उसी विद्यालय को प्रथम स्थान घोषित कर दिया।

मैदान में मौजूद बड़ी संख्या में दर्शकों ने मार्टिनेट स्कूल की प्रस्तुति को श्रेष्ठ बताया, तालियों से सराहा, लेकिन जनभावनाएं निर्णायक निर्णय को बदल नहीं सकीं।
*जब प्रस्तुति बोझ लगने लगे*

हास्यास्पद स्थिति तब बनी जब एक नामी निजी विद्यालय द्वारा अंत में दी गई सामूहिक गान की प्रस्तुति देखकर ऐसा प्रतीत हुआ मानो उसे औपचारिकता निभाने के लिए जबरन मंच पर भेजा गया हो।
दिखावे और स्टेटस की अपेक्षा प्रस्तुति का स्तर कमजोर नजर आया—जो आयोजन की गुणवत्ता पर सवाल छोड़ गया।
*शांति समिति की बैठकों का क्या अर्थ?*
हर वर्ष शांति समिति की बैठकों में जिम्मेदारियां सौंपी जाती हैं, पुराने निर्देश दोहराए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत एक बार फिर सामने आ गई।
राष्ट्रीय पर्व जैसे अवसर पर भी यदि एक विद्यालय को खुलेआम पुरस्कार का बहिष्कार करना पड़े, तो यह केवल एक स्कूल का विरोध नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर सवाल है।
निष्कर्ष–
77वें गणतंत्र दिवस का यह आयोजन जहां देशभक्ति का संदेश देता है, वहीं यह भी दिखाता है कि जिम्मेदार जनप्रतिनिधि और अधिकारी अपने दायित्वों के प्रति कितने उदासीन हैं।
यदि व्यवस्थाएं बेहतर होतीं, नियमों का पालन होता और निष्पक्षता दिखाई जाती, तो शायद यह राष्ट्रीय पर्व विवाद नहीं, मिसाल बनता ।







