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आष्टा | राजनीतिक उपेक्षा की हद! राजमाता सिंधिया की पुण्यतिथि को ही भूल गए*

*आष्टा | राजनीतिक उपेक्षा की हद! राजमाता सिंधिया की पुण्यतिथि को ही भूल गए*
*दिनेश शर्मा आष्टा हलचल*

नगर भाजपा की कार्यशैली पर आज एक कड़ा सवाल खड़ा हो गया है। भारतीय जनता पार्टी की संस्थापक और जनसंघ आंदोलन की रीढ़ रहीं
राजमाता विजयाराजे सिंधिया
की पुण्यतिथि—और वही दिन, जब आष्टा में पार्टी के अधिकांश जनप्रतिनिधि, पदाधिकारी और नगर मंडल पूरी तरह बेखबर नजर आए।
दिनभर भाजपा के जिम्मेदार नेता अपनी-अपनी व्यस्तताओं और “मस्ती” में डूबे रहे। न कोई औपचारिक कार्यक्रम, न श्रद्धांजलि सभा, न ही पार्टी कार्यालय में कोई हलचल—मानो पार्टी अपनी ही संस्थापक को भूल बैठी हो।
शाम ढलते-ढलते यह कमी तब उजागर हुई, जब पार्टी के वरिष्ठ नेता व मार्केटिंग सोसायटी के पूर्व अध्यक्ष कृपाल सिंह पटाडा ने सादगी और संवेदना के साथ, चार शहरवासियों को साथ लेकर पुष्पमाला अर्पित की और राजमाता को याद किया। यही एकमात्र आयोजन था, जिसने दिनभर की राजनीतिक चुप्पी को तोड़ा।
यह सवाल अब आष्टा की राजनीति में गूंज रहा है—
क्या भाजपा में अब इतिहास की कोई कीमत नहीं?
क्या संस्थापक नेताओं की स्मृति भी औपचारिकता बनकर रह गई है?
और क्या संगठन की जमीनी संवेदना कुछ गिने-चुने व्यक्तियों तक सिमट चुकी है?
जिस पार्टी ने राजमाता विजयाराजे सिंधिया के विचारों से अपनी पहचान बनाई, उसी पार्टी के नगर नेतृत्व का यह रवैया गंभीर आत्ममंथन की मांग करता है।
आज श्रद्धांजलि एक व्यक्ति ने दी—कल इतिहास यह जरूर पूछेगा कि बाकी सब कहाँ थे?
आज के नेता केवल ओर केवल अपनी वाह वाही लूटने के साथ साफे प्रथा के ही मुख्य किरदार रह गए ?आज यह बहुत बड़ा प्रश्न हे जिसे हम अपनी खबर के अंत में छोड़ जा रहे हैं ।

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