*आष्टा | शहर का इकलौता खेल मैदान बना खेत, नपा मौन*—*आखिर किसकी चली बगैर अनुमति की ‘बख्खर’?*
*दिनेश शर्मा आष्टा हलचल*
आष्टा शहर का एकमात्र बड़ा और ऐतिहासिक खेल मैदान श्यामा प्रसाद मुखर्जी मैदान—जहां शहर की समस्त खेल प्रतियोगिताएं होती हैं, जहां रोज़ सैकड़ों युवा फुटबॉल, क्रिकेट खेलते हैं, और जहां अनेक नौजवान आर्मी भर्ती की तैयारी में पसीना बहाते हैं—आज कथित लोगों की मनमानी का शिकार बन गया है।
बिना नगरपालिका की किसी भी स्वीकृति के इस समतल मैदान पर बख्खर चलवा दी गई। नतीजा—खेल का मैदान अब मैदान नहीं, बल्कि खुदा-पिटा खेत बन चुका है। रोज़ाना होने वाली सभी खेल गतिविधियां पूरी तरह बाधित हो गई हैं। युवाओं का अभ्यास ठप, प्रतियोगिताओं पर सवाल और शहर की खेल संस्कृति पर सीधा प्रहार।
सबसे बड़ा और गंभीर सवाल यही है—
आखिर मैदान को खोदने की अनुमति किसने दी?
जब इस मामले में नपा के मुख्य अधिकारी सीएमओ विनोद प्रजापति से दूरभाष पर जानकारी ली गई, तो उन्होंने साफ शब्दों में किसी भी प्रकार की अनुमति से इनकार कर दिया। यानी नपा कह रही है—हमने कोई इजाज़त नहीं दी।
तो फिर सवाल और तीखा हो जाता है—
वह कौन है जो नपा प्रशासन से भी ऊपर खुद को समझ रहा है?
किसके इशारे पर शहर के सबसे बड़े सार्वजनिक मैदान को खोदने की हिमाकत की गई?
क्या सार्वजनिक संपत्ति अब किसी की निजी जागीर बन चुकी है?
यह सिर्फ मैदान खोदने का मामला नहीं, बल्कि नगरपालिका की साख, प्रशासनिक नियंत्रण और जवाबदेही पर सीधा सवाल है। यदि आज मैदान खोदा गया है, तो कल क्या स्कूल, पार्क और अन्य सार्वजनिक स्थल भी यूं ही उजाड़ दिए जाएंगे?
अब निगाहें नपा प्रशासन पर टिकी हैं—
क्या नगरपालिका इस गंभीर लापरवाही पर संज्ञान लेगी?
क्या दोषियों की पहचान कर उनके विरुद्ध सख्त कार्रवाई होगी?
या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?
शहर का युवा आज जवाब मांग रहा है…
और आष्टा पूछ रहा है—
कानून से बड़ा आखिर कौन?







