आष्टा में बीते दोनों शहरों के घटनाक्रम के बाद प्रशासन ने फुर्ती दिखाते हुए कई लोगों को जेल का रास्ता भी दिखा दिया। ओर शहर को फिर से भाईचारे के साथ अमन चैन की पटरी पर ला दिया ।
यहाँ तक तो सब ठीक था। लेकिन असली तमाशा तो उसके बाद शुरू हुआ… ।
एक तरफ मीडिया कवरेज को लेकर नेशनल न्यूज चैनल G TV के पत्रकार और पुलिस प्रशासन के बीच खींचतान चल रही है। की कौन सही है, कौन गलत? —इसफैसले के लिए मुख्य मंत्री ने जांच के आदेश दे ही दिए हे, ओर सक्षम अधिकारी पूरे मामले की जांच कर रहे हैं।
लेकिन इस पूरे प्रकरण में अचानक कुछ ऐसे नगर स्तरीय राजनीतिक व तथाकथित हिंदुत्ववादी चेहरे भी मैदान में कूद पड़े, जिनका जनाधार कागज़ से बाहर शायद ही निकलता हो…
इन महानुभावों ने बाकायदा पत्र जारी कर न्यूज चैनल के संवाददाता के खिलाफ ऐसा ज़हर उगला, मानो शहर की सारी समस्याओं की जड़ अब मीडिया ही हो। हैरानी की बात यह है कि जिन नेताओं को कभी प्रेस नोट छपवाने, फोटो खिंचवाने और बयान चलवाने के लिए मीडिया याद आती थी, आज वही नेता यह संदेश दे रहे हैं कि—
“अब हमें मीडिया की ज़रूरत ही क्या है?”
वैसे भी पत्रकार और पुलिस के बीच हुए घटनाक्रम में दोनों पक्ष अपने-अपने तर्कों के साथ मजबूती से खड़े हैं। बहस, सवाल और जवाब लोकतंत्र की खूबसूरती हैं। लेकिन इस बीच जनाधार विहीन लोगों का अचानक मीडिया विरोध में उतर आना, और वह भी पत्रों के ज़रिए, अपने आप में बड़ा रोचक दृश्य पेश करता है।
शहर में चर्चा है कि यह पत्राचार दरअसल निष्पक्षता से ज्यादा प्रशासन-भक्ति का प्रमाण है।
मतलब साफ है—
गलती किसकी है, यह मुद्दा नहीं…
मुद्दा यह है कि सवाल पूछने वाला अगर कैमरा लेकर खड़ा है, तो वह असहज क्यों लगने लगता है?
कुल मिलाकर, आष्टा में इन दिनों हालात ऐसे हैं कि घटित घटनाक्रम में प्रशासन अपनी
कार्रवाई बराबर कर रहा है । वही तर्क वितरक के साथ चोक चौराहों पर
बहस भी चल रही है।
, जारी पत्र से प्रतीत होता हे
की मीडिया को कोसने की प्रतियोगिता भी पूरे शबाब पर है ।
अब देखना यह है कि अगला पत्र किसके खिलाफ निकलता है—
पत्रकार के, या फिर उस सवाल के… जिसने यह सब बा मजबूरी करवा दिया।







