*आष्टा। नगरपालिका परिषद की साधारण बैठक में एक ओर कागज़ों पर नगर के सौंदर्यीकरण के बड़े–बड़े फैसले लिए गए, वहीं दूसरी ओर बैठक की कार्यवाही ने लोकतांत्रिक व्यवस्था और कानूनी प्रावधानों की धज्जियां उड़ाकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।*
*दिनेश शर्मा आष्टा हलचल*

परिषद की बैठक नपाध्यक्ष श्रीमती हेमकुंवर रायसिंह मेवाड़ा की अध्यक्षता में तो हुई, लेकिन असली कमान उनके प्रतिनिधि और पार्षद प्रतिनिधियों के हाथों में दिखी। बैठक के नियमों के विरुद्ध अध्यक्ष प्रतिनिधि और पार्षद प्रतिनिधि खुलेआम बैठक में शामिल रहे, आपत्तियों की उम्मीद में बैठे लोग देखते रह गए और सीएमओ विनोदकुमार प्रजापति लगभग असहाय नज़र आए।सरकार भले ही संविधान की दुहाई देकर महिला सशक्तिकरण, महिला आरक्षण और भागीदारी की बात करे, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह बैठक साफ–साफ उजागर कर गई कि नगर पालिका स्तर पर चुनी हुई महिलाएं अब भी महज़ “रबर स्टांप” बनकर रह गई हैं, जबकि निर्णय और दखल पुरुष प्रतिनिधि कर रहे हैं। सवाल यह है कि जब प्रतिनिधि ही वास्तविक सत्ता संभालेंगे, तो फिर महिला आरक्षण का असली लाभ किसे और कैसे मिल रहा है?महिला अध्यक्ष, पर नियंत्रण प्रतिनिधि के हाथनगरपालिका परिषद के साधारण सम्मेलन में नपाध्यक्ष श्रीमती हेमकुंवर रायसिंह मेवाड़ा की अध्यक्षता दर्ज की गई, पर बैठक के दौरान नपाध्यक्ष प्रतिनिधि रायसिंह मेवाड़ा और पार्षद प्रतिनिधि कई स्थानों पर निर्णायक भूमिका में दिखाई दिए। सूत्रों के अनुसार, कई प्रस्तावों पर चर्चा के दौरान मूल निर्वाचित पार्षदों की बजाय उनके प्रतिनिधि बोलते, दखल देते और सहमति बनवाते नज़र आए, जबकि यह पूरी प्रक्रिया अधिनियम और बैठक नियमों की मूल भावना के ख़िलाफ़ मानी जाती है।नगरपालिका द्वारा जारी आधिकारिक विज्ञप्ति में भले ही किसी पार्षद प्रतिनिधि का नाम नहीं जोड़ा गया, लेकिन परिषद सभागार में उनकी मौजूदगी और सक्रियता किसी से छिपी नहीं रही। जानकार इसे सुनियोजित तरीके से नियमों को दरकिनार कर, सत्ता का वास्तविक संचालन परदे के पीछे से करने की कवायद मान रहे हैं।
*सीएमओ बने ‘मूक दर्शक’*
, नियमों पर चुप्पीबैठक में मुख्य नगरपालिका अधिकारी विनोदकुमार प्रजापति मौजूद रहे, पर प्रतिनिधियों की भागीदारी और नियमों के उल्लंघन पर उन्होंने किसी प्रकार की आपत्ति दर्ज नहीं करवाई। न तो बैठक स्थगित करने की पहल की गई, न ही प्रतिनिधियों को बाहर जाने के लिए कहा गया। जानकारों का आरोप है कि प्रशासनिक अधिकारी की यह चुप्पी या तो दबाव में है या फिर लापरवाही, दोनों ही हालातों में यह लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए खतरनाक संकेत हैं।कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि परिषद की बैठक में केवल निर्वाचित सदस्य ही चर्चा और निर्णय का हिस्सा बन सकते हैं, प्रतिनिधि नहीं। ऐसे में यदि प्रतिनिधियों की सक्रिय भागीदारी के बीच निर्णय लिए गए हैं, तो भविष्य में इन पर कानूनी चुनौती खड़ी हो सकती है।
*10 प्रस्ताव, बिना विरोध के पास*
– *क्या यह महज़ औपचारिकता?*
नगर विकास और सौंदर्यीकरण के नाम पर इस बैठक में कुल 10 प्रस्तावों पर विचार–विमर्श दिखाया गया, लेकिन व्यवहार में सभी प्रस्ताव बिना किसी ठोस आपत्ति या गहन चर्चा के सर्वसम्मति से पारित कर दिए गए। सवाल यह उठ रहा है कि जब बैठक की संरचना ही संदेह के घेरे में है, तो सर्वसम्मति की यह पटकथा पहले से लिखी हुई तो नहीं?
बैठक में नगर के सौंदर्यीकरण को प्राथमिकता देते हुए निम्न प्रमुख प्रस्तावों पर मुहर लगा दी गई:पपनास नदी से भोपाल नाके तक डिवाइडर युक्त सड़क का चौड़ीकरण और सौंदर्यीकरण।भोपाल चौराहा स्थित महाराणा प्रताप स्थल और आसपास के क्षेत्र का सौंदर्यीकरण कार्य।पार्वती और पपनास नदी के संगम स्थल पर घाट निर्माण और सौंदर्यीकरण।पार्वती नदी डाउन स्ट्रीम पर पिचिंग कार्य और आसपास सौंदर्यीकरण।कई नागरिकों का तर्क है कि विकास के ये प्रस्ताव कागज़ पर अच्छे लगते हैं, लेकिन पारदर्शिता, तकनीकी सर्वे, सार्वजनिक आपत्तियों और वित्तीय प्रबंधन पर कोई खुली चर्चा सामने नहीं आई।नाली, कॉम्प्लेक्स और रसायन खरीद पर भी हरी झंडी ।सीएमओ विनोदकुमार प्रजापति के मुताबिक, बैठक में निम्न प्रस्तावों को भी स्वीकृति दी गई:प्रधानमंत्री आवास कॉलोनी के पास शॉपिंग कॉम्प्लेक्स निर्माण कार्य की तृतीय ई-निविदा में प्राप्त न्यूनतम दर को स्वीकृति।किलेरामा नगर सीमा से महाराणा प्रताप चौक तक आरसीसी नाली निर्माण की मंजूरी।जलशुद्धिकरण में उपयोग की जाने वाली एलम और ब्लीचिंग सामग्री की वर्ष 2024–25 की वित्तीय वार्षिक दरों की पुष्टि।वहीं, आउटसोर्स के कर्मचारियों के वेतन को भी परिषद द्वारा स्वीकृत किया गया। लेकिन यह कहीं दर्ज नहीं हुआ कि इन निर्णयों पर वित्तीय बोझ, प्राथमिकताओं की सूची और वैकल्पिक विकल्पों पर कोई गंभीर विमर्श हुआ या नहीं।प्रधानमंत्री ग्राम सड़कें, निकाय को हस्तांतरण – बड़ा निर्णय, इस मामले ने बहस न के बराबर, वैसे भी नपा में विपक्ष किस चिड़िया का नाम हे की नहीं जानता ।
प्रजापति ने जानकारी दी कि आष्टा विकासखंड की प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजनांतर्गत निर्मित मार्गों को नगरपालिका परिषद को हस्तांतरित करने पर परिषद ने सहमति दी है तथा शासन स्तर पर आगे की कार्यवाही के लिए प्रस्ताव भेजने पर भी मुहर लगाई गई।
इसी तरह पीडब्ल्यूडी विभाग द्वारा हस्तांतरित सड़कों पर निकाय स्वामित्व लेने का निर्णय भी हुआ। विशेषज्ञों का कहना है कि सड़कों का हस्तांतरण सुनने में भले ही विकास जैसा लगे, लेकिन इन सड़कों की मरम्मत–रखरखाव का पूरा वित्तीय बोझ अब निकाय पर आ सकता है। इसके लिए दीर्घकालिक योजना और बजट पर भी खुला रोडमैप जरूरी था, जो बैठक में कहीं सामने नहीं आया।
*कौन–कौन थे मौजूद*, *और कौन थे ‘छुपे हुए किरदार?*
बैठक में नपाध्यक्ष श्रीमती हेमकुंवर मेवाड़ा, नपाध्यक्ष प्रतिनिधि रायसिंह मेवाड़ा, विधायक प्रतिनिधि सुशील संचेती, नपाउपाध्यक्ष श्रीमती सिद्दीका भूरू खां, सीएमओ विनोदकुमार प्रजापति, पार्षद डॉ. सलीम खान, कमलेश जैन, डॉ. राजकुमार मालवीय, हिफ्फजुर्रहमान भैया मियां, राशिदा हुसैन, मेहमूद अंसारी, आरती सुभाष नामदेव, तस्कीन शेखरईस, नूरजहां अतीक कुरैशी, जाहिद गुड्डू, अनिता कालू भट्ट, तारा कटारिया, तेजसिंह राठौर, रवि शर्मा, अंजनी विशाल चौरसिया, लता तेजपाल मुकाती समेत अन्य अधिकारी–कर्मचारी मौजूद रहे।परंतु बड़ी बात यह रही कि पार्षद प्रतिनिधियों की आधिकारिक सूची विज्ञप्ति में नदारद रही, जबकि सभागार में उनकी मौजूदगी और सक्रिय भागीदारी को कई पार्षदों और उपस्थित लोगों ने साफ–साफ महसूस किया। इस दोहरी तस्वीर ने नगरपालिका प्रशासन की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं – क्या कुछ चेहरों को जानबूझकर परदे के पीछे रखा जा रहा है?*महिला सशक्तिकरण बनाम ‘प्रॉक्सी*’ राजनीतिसरकार महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने के लिए आरक्षण, प्रशिक्षण, नेतृत्व विकास जैसे कई कार्यक्रम चलाती है, पर नगर पालिका परिषद की यह तस्वीर बताती है कि ज़मीनी स्तर पर “प्रॉक्सी राजनीति” हावी है।महिला अध्यक्ष की कुर्सी पर महिला, पर असली फैसले पुरुष प्रतिनिधि लेते हैं।महिला पार्षद चुनी जाती हैं, पर परिषद की बहसों में बोलते उनके पति/परिजन।विज्ञप्तियों में महिला जनप्रतिनिधि के नाम, पर बैठक में सक्रियता पुरुषों की।यह सब मिलकर यह संदेश देता है कि लोकतंत्र की आत्मा यानी “प्रतिनिधि स्वयं प्रतिनिधित्व करे” की मूल भावना को तहखाने में बंद कर केवल औपचारिकताएं निभाई जा रही हैं।अब बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रशासन, विभाग और शासन स्तर पर कोई इस पूरी व्यवस्था पर संज्ञान लेगा? क्या इन बैठकों की वीडियोग्राफी, उपस्थिति रजिस्टर, कार्यवृत्त और कानूनी प्रावधानों की रोशनी में जांच होगी? या फिर यह सब एक और बैठक की तरह फाइलों में दर्ज होकर हमेशा की तरह रफ़ा–दफ़ा कर दिया जाएगा?







