आष्टा मंडी की बदहाली: अव्यवस्था के आगे जाम, किसान व व्यापारी दोनों परेशानआष्टा।
*दिनेश शर्मा आष्टा हलचल
कभी दक्ष प्रबंधन और व्यवसायिक सुगमता के लिए चर्चित रही आष्टा कृषि उपज मंडी आज अपने ही परिसर में बदहाली और अफरातफरी का शिकार हो चुकी है। वर्षों तक रोजाना 30-40 हजार बोरी उपज की नीलामी क्षमता रखने वाली मंडी अब प्रशासनिक लापरवाही के कारण 20 हजार बोरी भी सहजता से नीलाम नहीं कर पा रही है। जरा सी आवक बढ़ते ही मंडी परिसर के बाहर कन्नौद मार्ग, आवासीय क्षेत्र शांति नगर, मंडी के पीछे तक जाम की स्थिति बन जाती है और किसान-व्यापारी घंटों परेशान होते हैं।
भीड़ और ट्रैफिक में अपनी उपज से भरे वाहनों के साथ हैरान परेशान किसान समय पर नीलामी न हो पाने से स्थानीय मंडी प्रशासन ओर व्यापारी दोनो को दुखी मन से कोसता हे । इस भारी अव्यवस्था से केवल व्यापारियों का ही नुकसान होता है _ यह सब आज की हक़ीक़त है।
*नीति पर उठ रहे सवाल*
मंडी के वर्तमान हालात ने उसके प्रबंधन पर बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है। जहां आसपास की मंडियों में इन दिनों सिर्फ सोयाबीन की 20 हजार बोरी दैनिक नीलाम हो रही है, वहीं आष्टा में कुल नीलामी सिमटती जा रही है। किसानों के मन में अब यह बात घर करने लगी है कि अगर यही आलम रहा तो ऐसी स्थिति में वे आगे से आष्टा मंडी छोड़ कर अन्य मंडियों का रुख करेंगे ; जिसका सीधा नुकसान मंडी को एवं स्थानीय व्यापार को झेलना पड़ेगा।
*समाधान मौजूद,इच्छाशक्ति गायबस्थिति*
गंभीरता के बावजूद, प्रशासन की उदासीनता हैरान करती है। विशेषज्ञों का कहना है कि भोपाल नाके के पास स्थित बड़े खाली ग्राउंड का उपयोग कर, वहां से आने वाली ट्रॉलियों को अस्थायी पार्किंग में ही रोककर व्यवस्थित प्रवेश दिया जा सकता है। इसी तरह, कन्नौद-खातेगांव की दिशा से आने वाले वाहनों को नए दशहरा मैदान पर व्यवस्थित कर, मंडी के अंदर प्रवेश दिलाने की व्यवस्था बनाई जाए तो हालात बड़ी हद तक सुधर सकते हैं।
मगर आश्चर्य है कि इतना आसान हल अपनाने के लिए भी प्रशासन तैयार नहीं दिखता?
अंदरूनी व्यवस्था भी लचरमंडी परिसर के भीतर भी व्यवस्थागत संकट है। केवल एक शेड के नीचे ही सोयाबीन का एक लॉट सिंगल डाले लगवाने से भी परिसर एक तरफ पूरी तरह से जाम होकर सारी व्यवस्था को चौपट हो रही हे जबकि सोयाबीन के एक से अधिक फुटगर विक्रेताओं के वाहन सीमित रहने से यह फ़ुट्गर वाले शेड लगभग खाली पड़े रहते हे,
यह एक बड़ी लापरवाही है। जिस ओर मंडी प्रशासन ध्यान नहीं दे रहा हे।
ऐसे में प्रतिदिन सोयाबीन की नीलामी 20-30 हजार क्विंटल से घटकर महज़ 10-12 हजार क्विंटल पर जा पहुँची है। नुकसान और परेशानी दोनों का बोझ व्यापारी और किसान बराबर उठा रहे हैं।
*जरूरी है प्रशासन की फौरन पहल*
अब वक्त आ गया है कि मंडी और प्रशासन दोनों जागें। सोयाबीन के सभी नीलामी शेड का समुचित उपयोग कर, सभी तरह के वाहन सभी शेड में लगवाए, जिससे कि आधे परिसर में लगने वाले बार बार के जाम से निजात मिल जावेगी । साथ ही मंडी के बाहर स्मार्ट ट्रैफिक प्रबंधन लागू करें—तो अफरातफरी पर लगाम लग सकती है। किसानों और व्यापारियों की एक ही माँग है—शीघ्र और असरदार व्यवस्था, जिससे आष्टा मंडी का गौरव और किसान-व्यापारी दोनों का विश्वास लौट सके।
देखना होगा आखिर स्थानीय प्रशासन ओर मंडी प्रशासन इस समस्या को लेकर कब तक जागरूक होता हे ?







