देहली वर्ल्ड पब्लिक स्कूल का बाल दिवस कार्निवल 2025:
दिखावे में दबा बच्चों का असली उत्साह।
*दिनेश शर्मा आष्टा हलचल*
AHOY 3.0 थीम पर चमक से ज़्यादा हंगामा दिखा देहली वर्ल्ड पब्लिक स्कूल आष्टा में। आयोजित बाल दिवस कार्निवल “AHOY 3.0”अव्यवस्था और औपचारिकता के चलते पूरा समय चर्चा का विषय बना रहा। भले ही इसका विषय “विशिष्ट खोजों के युग: प्राचीन ज्ञान से तारों तक की तकनीक” रखा गया था, लेकिन आयोजन में रचनात्मकता की तुलना में दिखावे और प्रदर्शन पर अधिक ज़ोर दिखाई दिया। विद्यालय परिसर की सजावट भले आकर्षक रही हो, परंतु यह बच्चों की वास्तविक भागीदारी और सृजनशीलता को ढक गई। बच्चो क़े उत्साह वर्धन और सोशल गतिविधियों मे बच्चो की रूचि क़ो बढ़ाने क़े लिए आयोजित यह कार्यक्रम इसलिए भी औपचारिक दिखाई दिया की बच्चो के आलावा ईस कार्यक्रम मे स्कूल क़े बाहर से सशुल्क अनुबंधित कुछ स्टाल लगवाएं गए जो की स्कूल प्रबंधन की उदासीनता और महज दिखावे क़ो दर्शा रहे रहे थे।
दीप प्रज्वलन और सरस्वती वंदना के पारंपरिक आरंभ के बाद यह कार्यक्रम जल्द ही समयबद्धता और समन्वय की कमी का उदाहरण बन गया। निर्णायक मंडल और अतिथि कलाकारों की प्रशंसा में तो खूब समय लिया गया, पर बच्चों की मेहनत और उनके प्रयासों पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया गया। कई अभिभावकों ने कार्यक्रम की तैयारी में अव्यवस्था, तकनीकी त्रुटियों और स्टॉलों पर भीड़ प्रबंधन की कमजोरी को लेकर नाराज़गी व्यक्त की। बच्चो क़ो अपने द्वारा लगाए स्टालो पर केवल टोकन जमा करना पड़ रहे थे, क्योंकि टोकन क़े शुल्क की वसूली व्यवस्था सिर्फ प्रबंधन क़े हाथो मे थी।
जिस तरह से प्रबंधन ने स्टालो पर बच्चो से दोगुनी क़ीमत मे सामान बिकवाया क्या यही राशि बच्चो क़ो वितरित होंगी? या प्रबंधन अपने हुए खर्च मे समाहित कर लेगा? प्राचार्या डॉ. संगीता सिन्हा ने नवाचार और वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर तो बल दिया, मगर बच्चों की प्रस्तुतियों में अधूरी तैयारियाँ और जल्दबाज़ी साफ़ नज़र आई। “जंगल से अंतरिक्ष” थीम पर लगाए गए कई स्टॉल बिना पर्याप्त जानकारी और मार्गदर्शन के तैयार किए गए थे। कुछ मॉडल अधूरे थे, जबकि कई छात्रों को अपने विषय की गहराई से जानकारी ही नहीं थी।सांस्कृतिक कार्यक्रमों का संचालन अपेक्षा के अनुरूप नहीं रहा। ध्वनि व्यवस्था भी अनुकूल नहीं दिखी जिससे दर्शक असहज हो उठे।
रैंप वॉक और “कपल डांस प्रतियोगिता” जैसी गतिविधियाँ बच्चों की प्रतिभा दिखाने के बजाय माता-पिता की प्रतिस्पर्धा का मंच बनकर रह गईं। “क्रिएटिव कॉर्नर” और “एंटरप्रेन्योर स्टॉल्स” पर भी कई वस्तुएँ केवल औपचारिकता के लिए प्रदर्शित की गईं, जबकि बच्चों की मौलिकता कहीं नजर नहीं आयी
।लाइव आर्ट प्रतियोगिता और प्रदर्शनी में कम भागीदारी देखने को मिली।
कई प्रतिभागियों ने कहा कि उन्हें समय और सामग्री की सीमाओं के कारण अपनी कला पूरी तरह व्यक्त करने का अवसर नहीं मिला। प्रदर्शनी में कुछ चयनित चित्रों को ही महत्व दिया गया, जबकि कई रोचक रचनाएँ अनदेखी रह गईं।राकेश शर्मा और शुभांशु शुक्ला को समर्पित प्रदर्शन भले प्रेरणादायी बताई गई, पर बच्चों ने इसे महज़ तैयार की गई स्क्रिप्ट के रूप में दोहराया।
कार्यक्रम के समापन पर “जंगल से बृहस्पति तक” थीम वाली रोशनी को भी कई लोगों ने संसाधनों की बर्बादी बताया। उपस्थित अभिभावकों में यह भावना प्रमुख रही कि यदि इतना खर्च बच्चों की वास्तविक शिक्षा और नवाचार पर किया जाता, तो परिणाम अधिक सार्थक होते।
अंत में, बाल दिवस कार्निवल AHOY 3.0 ने यह सवाल छोड़ दिया कि क्या इस प्रकार के कार्यक्रम बच्चों की प्रतिभा को सच में निखारते हैं, या फिर ये केवल विद्यालय की औपचारिक प्रतिष्ठा दिखाने का माध्यम बनकर रह जाते हैं।
वैसे भी ईस तरह क़े स्कूल क़े दिखावे वाले कार्यक्रम ईस स्कूल क़े लिए नये नहीं हैं।
अधिकांश कार्यक्रम मे स्कूल प्रबंधन बच्चो क़े लिए कम अपने दिखावे क़े लिए ज्यादा आयोजित करता हैं। यही वज़ह हैं की यह स्कूल वह मुकाम हासिल नहीं कर पाया जैसा की वह दिखावा करता हैं।







