100-100 मीटर सड़क, ओर 4- 4 लाख खर्च… मजबूती कितने दिन?
आष्टा।, *विकास के नाम पर जनता से प्राप्त गाड़ी कमाई का खुला दोहन*
*दिनेश शर्मा आष्टा हलचल*
प्राचीन शंकर मंदिर मार्ग पर महाशिवरात्रि से ठीक पहले शुरू हुआ डामरीकरण अब सवालों के घेरे में है। महीनों से जर्जर पड़ी सड़क पर प्रशासन की नींद ठीक पर्व के एक दिन पहले खुलना व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर बड़ा प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है।
स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि कार्य गुणवत्ता से अधिक “दिखावे” पर केंद्रित नजर आ रहा है। कई स्थानों पर बिना समुचित बेस तैयार किए सीधे डामर बिछा दिया गया। गड्ढों की सही मरम्मत और सतह समतल किए बिना ही परत डालने से सड़क की दीर्घकालिक मजबूती पर संदेह पैदा हो गया है। कहीं मोटाई असमान है तो कहीं किनारों पर रोलर का प्रभाव अधूरा दिखाई दे रहा है।

लगभग 4 लाख रुपये की लागत से मात्र 100 मीटर सड़क — यह आंकड़ा भी चर्चा का विषय बना हुआ है। नागरिक पूछ रहे हैं कि क्या इस कार्य की स्वतंत्र तकनीकी जांच कराई जाएगी? क्या डामर मिश्रण, परत की मोटाई और गुणवत्ता मानकों का परीक्षण सार्वजनिक होगा?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह कार्य वास्तव में श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए है या फिर पर्व से पहले औपचारिक उपस्थिति दर्ज कराने का माध्यम?
जनता के सवाल सीधे हैं—
महीनों तक खराब सड़क पर ध्यान क्यों नहीं दिया गया?
क्या कार्यादेश और माप पुस्तिका सार्वजनिक की जाएगी?
क्या ठेकेदार से गुणवत्ता की लिखित गारंटी ली गई है?
यदि सड़क उखड़ती है तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी? क्योंकि अब कसाईपुरा चौराहे से लगाकर एसडीओपी कार्यालय तक हुआ डामरीकरण अपनी घटिया होने की हकीकत स्वयं बता रहा हे, की किस तरह से केवल औपचारिकता निभाकर जनता की भावनाओं का खुला मखौल उड़ाया जा रहा हे!
नागरिकों का कहना है कि यदि निर्माण मानकों के अनुरूप नहीं हुआ तो पहली ही बारिश सच्चाई उजागर कर देगी। ऐसे में सरकारी धन की बर्बादी और जनता की परेशानी दोनों तय मानी जा रही हैं।
आष्टा की जनता अब सिर्फ सड़क नहीं, पारदर्शिता और जवाबदेही चाहती है। यदि कार्य में लापरवाही पाई जाती है तो संबंधित जिम्मेदारों पर कार्रवाई अनिवार्य होनी चाहिए। अन्यथा हर त्योहार से पहले “तत्काल विकास” और बाद में “स्थायी गड्ढे” — यही क्रम चलता रहेगा।







