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*जीवनदायिनी माँ पार्वती बनी उपेक्षा का शिकार* *श्रमदान की नौबत क्यों आई? जिम्मेदारों की लापरवाही पर उठे सवाल*इस तरह के श्रमदान वास्तविकता या केवल फोटोसेशन?

📰 आष्टा

*जीवनदायिनी माँ पार्वती बनी उपेक्षा का शिकार*
*श्रमदान की नौबत क्यों आई? जिम्मेदारों की लापरवाही पर उठे सवाल*

*दिनेश शर्मा आष्टा हलचल*

आष्टा — जिस माँ पार्वती नदी को नगर की जीवनदायिनी कहा जाता है, आज वही नदी प्रशासनिक उदासीनता और सामाजिक लापरवाही के कारण कचरे के ढेर में तब्दील होती नजर आ रही है। “जल ही जीवन है” जैसे संदेश मंचों तक सीमित रह गए हैं, जबकि जमीनी हकीकत यह है कि नदी के तट प्लास्टिक, गंदगी और गाद से अटे पड़े हैं।
बीते दिवस माँ पार्वती नदी पर आयोजित श्रमदान कार्यक्रम ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—जब नियमित सफाई और संरक्षण की जिम्मेदारी नगरपालिका की है, तो फिर आम नागरिकों को बार-बार श्रमदान के लिए क्यों उतरना पड़ रहा है? क्या यह जिम्मेदार तंत्र की असफलता का प्रमाण नहीं?

नदी तटों की सफाई के लिए नागरिकों, युवाओं और सामाजिक संगठनों को आगे आना पड़ा। लेकिन सवाल यह है कि नगर परिषद और संबंधित विभागों ने अब तक स्थायी योजना क्यों नहीं बनाई? क्या केवल फोटो सेशन और भाषणों से नदी निर्मल होगी?

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ जल के लिए संघर्ष करना पड़ेगा। शहर का गंदा पानी और प्लास्टिक सीधे नदी में पहुंच रहा है। और इसके लिए पूरी तरह से नगरपालिका जिम्मेदार नजर आ रही है क्योकि न तो प्रभावी निगरानी है और न ही दंडात्मक कार्रवाई।
इतना ही नहीं शहर में नगरपालिका द्वारा प्रदाय किया जा रहा पानी की हकीकत आज सर्वविदित है की शहर में प्रदाय किया जा रहा पानी कितना शुद्ध और पीने लायक है?
नगरपालिका आपने कर्तव्यों के प्रति कितनी गेर जिम्मेदार हैं यह नदी की दुर्दशा बताती है ।
स्वच्छता के दावे और जमीनी हकीकत में भारी अंतर है। यदि हालात ऐसे ही रहे, तो “स्वच्छ नगर स्वस्थ नगर” का नारा महज औपचारिकता बनकर रह जाएगा।
आज जरूरत है धरातल पर कार्य करने की,न कि फ़ोटो खिंचवाने,
बीते दिवस जिस तरह से श्रमदान का दिखावा केआर नदी पर फ़ोटो सेशन हुआ उसने फिर सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या अब नदी किनारों पर नियमित सफाई व्यवस्था होगी? शहर में प्लास्टिक उपयोग पर सख्ती से नियंत्रण के लिए सतत्त अभियान चलेगा?
गंदा पानी रोकने हेतु ठोस प्लानिंग की जावेगी? साथ ही इतनी सब कार्यव्यवस्था के लिए जिम्मेदार अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही तय होगी? अगर इन सारी अवष्टज कार्यव्यवस्था को जिम्मेदारों ने अब भी गंभीरता से नहीं लिया तो यह माना जाएगा की इस तरह के अभियान नेताओ के लिए जनता को प्रलोभित करने के लिए केवल दिखावा मात्र ही हैं,या यू कहें की सिर्फ और सिर्फ नेता फ़ोटो सेशन जे लिए इस तरह के नाटक करते हे । और श्रमदान की यह तस्वीरें हर साल दोहराई जाएंगी, और नदी की पीड़ा बढ़ती जाएगी।
आष्टा की जीवनदायिनी माँ पार्वती को बचाना है तो सिर्फ अपील नहीं, बल्कि कठोर कार्रवाई और दीर्घकालीन योजना अनिवार्य है। अब देखना यह है कि जिम्मेदार विभाग जागते हैं या फिर नदी की पुकार यूँ ही अनसुनी रह जाएगी।

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