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मुख्य संपादक:- श्री पीयूष शर्मा

आष्टा *हम तो कहेंगे —–!*। *दिनेश शर्मा आष्टा हलचल*

आष्टा
*हम तो कहेंगे —–!*। *दिनेश शर्मा आष्टा हलचल*
पर्यावरण बचाओ, धरती पर पेड़ लगाओ, यह अभियान धरातल पर कितना सार्थक हो रहा है, हर खासो आम जनता है ,।
अधिकारी हो या नेता पोधा लगाने में तो विश्वास रखते है पर उनकी देखभाल केसे होगी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता, क्योंकि आज पोधा रोपण करना भी एक तरीके से , झूठी लोकप्रियता हासिल करने का एक साधन मात्र हो गया हैं । अधिकांश देखने में आता है की , फोटो सेशन के लिए लगाए जाने वाले पोधो की कोई भी जिम्मेदारी से देखभाल नहीं करता, और जीवन दायक पौधे पेड़ बनने के पहले ही बे सहारा होकर दम तोड देते है ।
इस लिए यह जुमला अब किताबो के पन्नो पर और फोटो सेशन में दिखावा करने वालो के लिए बहुत सुंदर वाक्य हो सकता हे , हकीकत में तो आम जनता हो या जिम्मेदार शासन प्रशासन सबके लिए कोरा दिखावा होकर बेमानी नजर आता है,।
ऐसा नहीं की सरकार इस जीवन दायक प्रोजेक्ट पर ध्यान नहीं देती , बल्कि करोड़ों अरबों रुपए इस प्रोजेक्ट पर सालाना खर्च करती है , पर शासन का जिम्मेदार विभाग अपनी जवाब दारी और जिम्मेवारी, कितनी ईमानदारी dr निभाता है जग जाहिर हैं, मालवा में एक कहावत है कि घर के बैल ही जब बागड़ खा जावे तो कोई क्या करे, यही हाल जिम्मेदार विभाग का है,
वरना क्या मजाल कि क्षेत्र में अवेध रूप से पेड़ो की कटाई और लकड़ी का व्यापार दिन दोगुना रात चार गुना फलता फूलता रहे, और विभाग यदा कदा कार्यवाही कर अपनी ईमानदारी के कसीदे गड़ता रहे ।
, यह हम इस लिए भी कह रहे हैं कि विभाग की कार्यवाहियों में लकड़ी और अन्य संसाधन तो पकड़ में आ जाते हैं पर अक्सर आरोपी भागने में सफल हो जाते हैं?
अगर जिम्मेदार वन विभाग ही अपनी जिम्मेदारी का सही रूप से निर्वाह करे तो
वरना क्या हिमाकत लकड़ी चोरों की की क्षेत्र में अवेध रूप से अपना कारोबार कर सके, ।
क्षेत्र के कुछ गांव है जिन्हे पूरा क्षेत्र लकड़ी का अवेध व्यापार के मुख्य ठिकाने के रूप में जानते हैं।अवेध रूप बेस कीमती सागवान का व्यापार करने वाले जो आज विभाग की शह पर ही परजीवी अमरबेल की तरह फल फूल रहे हे।
शहर के फर्नीचर मार्ट हो या चल रही दर्जनों आरामशीन, सब के सब जिम्मेदारो की मिलीभगत से आर्थिक रूप से भारी मुनाफा कमा कर पर्यावरण को ठेंगा बता रहे है,।
वन विभाग के साथ साथ राजस्व विभाग भी बहुत हद तक लकड़ी और पेड़ो की अवेध कटाई के लिए जिम्मेदार है। क्योंकि सागवान को छोड़ कर लकड़ी की अनेकों प्रजातियां हैं जो राजस्व विभाग के अंतर्गत आती है , किंतु विभाग की उदासीनता के चलते रोजाना तहसील कार्यालय के सामने से ही लकड़ियों से भारी ट्रालियां आरामाशिनो पर आते जाते देखी जा सकती है, क्या यह सारा कारोबार बकायदा टीपी कट कर होता है , कहना जरा मुश्किल है,
जंगल में कुल्हाड़ी खुल कर चल रही है,। यह विभाग भलीभाती जनता है और समझता भी है, किंतु आम जनता पौधे लगाने पर्यावरण बचाने के प्रयास में लगा हुआ है, वही जिम्मेदार अपनी जिम्मेदारी विमुख होकर स्वयं को हरा भरा करने में तल्लीन है, ऐसे में किससे उम्मीद करे की वह अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी से निभायेगा?
आज फर्नीचर दुकानों का सूक्ष्मता से सत्यापन हो तो हकीकत पता लग सकती है की वास्तविकता क्या है? आज जिस तरह सेजंगल से पेड़ो की कटाई हो रही है, और जंगल उजाड़ होकर वीरान होते जा रहे हे, उससे दिखाई देता हे की विभाग की अप्रत्यक्ष सहयोग से ही सारा खेल चल रहा हे , वैसे भी कभी कभार की जाने वाली कार्यवाहियां ही इस खेल की पुष्टि करती है।
आज प्रकृति उलट फेर से पौधो की पर्यावरण की याद तो आती है हर व्यक्ति चाहता है, पर्यावरण बचाने की, पौधे लगाने की, पर कम ही लोग हैं जो की अपने लगाए पौधो की जी जान से देखभाल करते हैं
इतनी सारी बाते लिखने के पीछे भी यही आशय है की पर्यावरण बचाने , पौधे लगाने के यह जुमले कागजों की शोभा न रहे, हकीकत की परवान चढ़े, ।और इसके लिए हम सबको मन से इस अभियान को सार्थक करना चाहिए , क्योंकि पर्यावरण तब ही बचेगा जब पौधे पेड़ बनेंगे, , यह प्रयास आज प्रकृति के संतुलन के लिए अति आवश्यक हो गया है।

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