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प्रधान संपादक:- श्री दिनेश शर्मा
मुख्य संपादक:- श्री पीयूष शर्मा

*हम तो कहेंगे—! *डोंडी, ढोल और “स्वयंभू जनाधार” का जन्मदिन महोत्सव,अब आम बात हो गई*

*डोंडी, ढोल और “स्वयंभू जनाधार” का जन्मदिन महोत्सव,अब आम बात हो गई*

*हम तो कहेंगे———-!*

*दिनेश शर्मा,आष्टा हलचल*

नगर की राजनीति भी अब अजीब मोड़ पर आ खड़ी हुई है।
जहाँ कभी जनसेवा के दम पर पहचान बनती थी, वहीं अब पहचान बनाने के लिए “स्वयं रचित लोकप्रियता” का सहारा लिया जाने लगा है।

पिछले दिनों नगर में एक स्थानीय कथित नेता का जन्मदिन ऐसा मना कि पूरे शहर में चर्चा का विषय बन गया।
जिसे देखो वही यही पूछता नजर आया —
“भाई साहब, ये जन्मदिन था या अस्तित्व बचाने का अभियान?”

सुबह से लेकर रात तक शहर में बधाइयों की ऐसी बौछार चली मानो कोई ऐतिहासिक दिवस हो।
चौराहों पर पोस्टर, गलियों में बैनर, सोशल मीडिया पर स्वयंभू शुभचिंतकों की बाढ़ और ऊपर से डोंडी पिटवाकर लोगों को याद दिलाना कि “आज नेता जी का जन्मदिन है”…
यह सब देखकर जनता भी मुस्कुरा उठी।

राजनीति में जब जनाधार मजबूत होता है तो भीड़ खुद चलकर आती है,
लेकिन जब जनाधार खिसकने लगे तो फिर भीड़ को बुलाने के लिए माइक, मैसेज, पोस्टर और प्रचार वाहन सब लगाने पड़ते हैं।
नगर में पिछले दिनों कुछ ऐसा ही दृश्य दिखाई दिया।

वैसे भी अब सोशल मीडिया का दौर है।
यहाँ वास्तविकता ज्यादा देर पर्दे में नहीं रहती।
कौन कार्यक्रम में स्वयं आया और कौन “फोन पर आग्रह” के बाद पहुँचा — यह बात चाय की दुकान से लेकर पान ठेलों तक मिनटों में चर्चा बन जाती है।

शहर के राजनीतिक गलियारों में इन दिनों एक नया ट्रेंड खूब फल-फूल रहा है —
“पहले खुद कार्यक्रम बनाओ, फिर खुद ही भीड़ का आंकलन बताओ, और अंत में खुद ही लोकप्रियता का प्रमाणपत्र बाँट दो।”

छुटभैय्या राजनीति का यह नया मॉडल बड़ा दिलचस्प है।
जनता भले ही रोजमर्रा की समस्याओं से जूझती रहे, लेकिन नेताओं के पोस्टरों में “जननायक”, “युवाओं की धड़कन”, “नगर का गौरव” जैसे विशेषणों की कमी नहीं रहती।

असल में राजनीति अब सेवा से ज्यादा “दिखावे की कला” बनती जा रही है।
जहाँ वास्तविक जनसमर्थन कम और कैमरों के सामने भीड़ का एंगल ज्यादा मायने रखता है।
नगर की जनता भी अब समझदार हो चुकी है।
वह तालियों की आवाज और वास्तविक समर्थन के फर्क को अच्छी तरह पहचानने लगी है।

कहते हैं कि राजनीति में जमीन मजबूत हो तो जन्मदिन पर लोग स्वयं घर पहुँचते हैं,
लेकिन जब अस्तित्व संकट में हो तो फिर नेता जी को खुद ही डोंडी पिटवानी पड़ती है कि —
“भाइयों-बहनों, कृपया याद रखें… आज हमारा ही जन्मदिन है!”
नगर में चल रहे इस तरह के ट्रेंड को देखकर हम तो बस यही कहेंगे की ——-
नगर की वर्तमान राजनीति की यही सबसे दिलचस्प तस्वीर है
जहाँ लोकप्रियता कम और उसका प्रचार ज्यादा दिखाई देता है। अब तो इस तरह की तस्वीर शहर में रोजमर्रा की बात हो गई है ।

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