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प्रधान संपादक:- श्री दिनेश शर्मा
मुख्य संपादक:- श्री पीयूष शर्मा

“#आष्टा का शिक्षा विभाग या भ्रष्टाचार का दरबार?*” *सरकारी स्कूल चरनोई, निजी स्कूल बन गये टकसाल —* * बच्चों का भविष्य किसके हवाले?* “*आष्टा में स्कूल नहीं, ‘सेटिंग सेंटर’ चल रहे हैं!”* *बच्चों का भविष्य दांव पर, जिम्मेदार मौन क्यों?”*

“#आष्टा का शिक्षा विभाग या भ्रष्टाचार का दरबार?*”
*सरकारी स्कूल चरनोई, निजी स्कूल बन गये टकसाल —* * बच्चों का भविष्य किसके हवाले?*
“*आष्टा में स्कूल नहीं, ‘सेटिंग सेंटर’ चल रहे हैं!”*
*बच्चों का भविष्य दांव पर, जिम्मेदार मौन क्यों?”*

आष्टा। दिनेश शर्मा आष्टा हलचल*
अगर ज़मीन पर हकीकत देखी जाए तो सवाल सीधा है — क्या आष्टा का शिक्षा विभाग अब शिक्षा से ज्यादा ‘सेटिंग’ का केंद्र बन चुका है?
सरकारी स्कूलों की हालत यह है कि कुछ शिक्षकों ने उन्हें अपनी निजी चरनोई भूमि समझ लिया है।
मर्जी हुई तो स्कूल पहुंचे, मर्जी हुई तो गायब! और हैरानी की बात यह कि लाखों की तनख्वाह सरकार से लेने वाले “मास्टर साहब” खुद कम और उनके द्वारा नियुक्त 4-5 हजार में काम करने वाले बेरोजगार युवक ज्यादा पढ़ाते नजर आ रहे हैं।

 


* “नेतागिरी चमकाओ, पढ़ाई किसी और से कराओ!”*
*
कुछ शिक्षक पूर्व समय में आष्टा में रहकर नेतागिरी साध रहे हैं, और स्कूल में उनकी जगह कोई अस्थायी युवक बच्चों को संभाल रहा है। पूरे ग्रामीण क्षेत्र सहित आष्टा नगरीय क्षेत्र में व्याप्त गंभीर अनियमितताओं को देखकर हर बुद्धिजीवी सोचने पर विवश हो रहा हे कि क्या यही शिक्षा है ?या सरकार की इस व्यवस्था के साथ खुला मज़ाक?
हैरत तो जब होती हे कि विभागीय जिम्मेदारों को सब कुछ मालूम है… पर मोन साधकर यह फर्जीवाड़े का खेल दर्शक बन चुपचाप देख रहे हो, ।इससे यह अंदाजा भी लगता हे कि जब “पूरे कुएं में भांग घुली हो” तो ईमानदारी की उम्मीद आखिर किससे की जावे ,?
और हां जब कोई पत्रकार इन शिक्षा माफियाओं ओर सरकारी स्कूलों को अपनी टकसाल समझने वाले मास्टरों के खिलाफ , कलम उठाता है — तो जवाब में तथ्य नहीं, बल्कि फोन पर गाली-गलौज और दादागिरी मिलती है। मतलब सरकारी शिक्षा विभाग में शिक्षा देने वाले कारिंदे किस कदर से बेलगाम हो गये हे , बीते दिनों का एक वायरल ऑडियो, ओर नरपा खेड़ी में पदस्थ एक शिक्षक के खिलाफ हुई प्रथम दृष्टया रिपोर्ट खुद बा खुद बता रही हे ।

 

* गली-मोहल्लों में “स्कूल या उद्योग”?*
*
आष्टा शहर और ग्रामीण क्षेत्रों की गलियों में जिस तरह से कुकुरमुत्तों की तरह स्कूल उगे हुए हे या उग रहे हे,आज उनकी हकीकत देखे तो
भवन का किरायानामा संदेहास्पद, बिल्डिंग कही ओर हे , स्कूल कही ओर संचालित हो रहा हे ।
स्टाफ सूची फर्जी, मान्यता आवेदन में दर्ज नामों से जरा भी मेल नहीं हो रहे। मिडिल स्कूल में हाई स्कूल ओर हायर सेकेंडरी स्कूल के बच्चों जो गैर कानूनी रूप से एडमिशन कर रखे हे उन बच्चों को पढ़ाने वाले शिक्षकों की योग्यता भी संदिग्ध ही दिखाई देती है।
आष्टा शहर में बिंदास एक ही बिल्डिंग में 3-3 स्कूल संचालित ही रहे हे, ओर इस गंभीर अनियमितता के बारे में सभी जिम्मेदार जानते बाखूबी जानते हे, ऐसे में जिम्मेदारों की ईमानदारी पर शक होना लाजमी हो जाता हे ।
मिडिल की मान्यता, पढ़ाई हाई स्कूल ओर -हायर सेकेंडरी तक , ओर इन स्कूलों के बच्चे कोनसे स्कूलों में अटैच करवा कर खेल खेला जा रहा हे आज हर जागरूक इंसान जान रहा हे।
अब सवाल उठता है — की इतनी सारी गंभीर अनियमितताएं होकर अगर स्कूल संचालित हो रहे है तो फिर व्यक्ति सोचने पर विवश हो जाता है कि इन स्कूलों की मान्यताओं पर हस्ताक्षर किन नियमों के तहत हुए? जिम्मेदार मान्यता देने से पूर्व स्कूलों का
निरीक्षण और सत्यापन क्या सिर्फ कागज़ों में, ही कर रहे हे ,,? वरना क्या वजह हो सकती हे कि नियमों मापदंडों से कोसों दूर यह स्कूल बीते वर्षों से बेखौफ संचालित हो रहे हे । एक ओर हैरत वाली बात सुनने में आ रही हे कि कुछ स्कूल तो फिजिकली बंद हो जाने के बाद भी संभवतः कागज़ों में चालू… दिखाई दे रहे हे, और सरकार से जहां आरटीई की फीस का लाभ बेखौफ उठा रहे हैं, वही गैर मान्यता वाले स्कूलों में अटैच बच्चों की परीक्षाएं इन्हीं स्कूलों के माध्यम से हो रही है।
* “लक्ष्मी कांत प्यारे लाल” का मधुर संगीत*
*
जब नियमों की धज्जियां उड़ रही हों और “लक्ष्मी” का संगीत मधुर बज रहा हो, तो फिर सब मस्ती में क्यों न रहें?
शिक्षा अब जिम्मेदारी नहीं, बल्कि शिक्षा माफियाओं की टकसाल बन चुकी है।
ग्रामीण क्षेत्रों में खुली लापरवाही, शहर में संगठित खेल —
और जिम्मेदार पदों पर बैठे कुछ लोग या तो अयोग्य हैं या फिर समझौतों के सहारे आसीन। आज बड़ा सवाल यह हे कि
क्या जिला प्रशासन इस पूरे खेल की निष्पक्ष जांच कराएगा?
क्या फर्जी मान्यताओं को रद्द किया जाएगा?
क्या सरकारी शिक्षकों की वास्तविक उपस्थिति का सोशल ऑडिट होगा?
और सबसे बड़ा — क्या बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ करने वालों पर एफआईआर होगी? जैसे अनेकों बिंदु तथ्य आदि खुद बा खुद चीख चीख कर कह रहे हे कि क्या जिला प्रशासन चल रही इन भर्राशाहीयो पर संज्ञान लेगा ?या इसी तरह की व्यवस्थाएं सुचारू रहेगी, ओर स्थानीय स्तर पर बैठे जिम्मेदार भारी रूप में नावा पीटते रहेंगे?

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