आष्टा
शहर की प्यास बुझाने नगरपालिका आष्टा ने रामपुरा डेम से कीमत अदा कर 2 एमसीएम पानी नदी में छुड़वाया, लेकिन हमेशा की तरह निगरानी के अभाव में आष्टा तक कितना पानी आएगा यह तो समय ही बताएगा ? ओर कितना रास्ते में ही गुम हो जाएगा ।
दिनेश शर्मा आष्टा हलचल
ग्रीष्म से पहले जलसंकट रोकने के खोखले दावों के साथ रामपुरा जलाशय से आष्टा शहर के लिए नपा आष्टा ने पार्वती नदी के सहारे शहर के लिए 2 एमसीएम पानी इस बार भी छुड़वाया ।लेकिन सवाल वही पुराना—क्या यह पानी पूरा का पूरा आष्टा तक पहुंचेगा, ? या निगरानी की कमी से रास्ते में ही आधे से ज्यादा “गायब” हो जाएगा? क्योकि निगरानी का ड्रामा नगरपालिका द्वारा हर साल दोहराया जाता है, पर नतीजा शून्य!

नपाध्यक्ष के पति रायसिंह मेवाड़ा ने अधिकारियों संग रामपुरा जलाशय जाकर पानी छोड़ने की औपचारिकता निभाई और अपील की कि पानी व्यर्थ न बहे। वैसे भी सभी प्रकार की अपील हो या एनी कार्य अध्यक्ष के पति ही करते है मूल अध्यक्ष तो आज भी पूरी तरह से रबर स्टैम्प ही बनी हुई है ।
मुख्य नगरपालिका अधिकारी विनोदकुमार प्रजापति के मुताबिक, रामपुरा जलाशय में 4.25 एमसीएम आरक्षित हे ,में से 2 एमसीएम नपा ने शहर की प्यास बुझाने छुड़वाया ।
लेकिन जमीनी हकीकत आज भी यह हे कि छुड़वाए पानी में से कितना पानी शहर वासियों को मिलेगा, ओर कितना नपा की
उदासीनता की भेंट चढ़ जाएगा, जैसा कि बीते वर्षों की हकीकत रही हे, आज कह पाना मुश्किल है?
*निगरानी तंत्र पर सवालों की बौछार*
पार्वती नदी मार्ग पर स्टॉप डेम और अस्थायी बैंड बांधने, के साथ सीधे नदी में जल मोटर डाल कर किसान बेखौफ सिंचाई करते हे, यह जानकारी आम हैं सूत्र चीख-चीखकर बता रहे—किसान बेधड़क पानी रोककर अपनी फसलें सींच लेते हैं। ओर नगरपालिका “सर्चिंग दल” का ढोंग रचती है, लेकिन ये दल कागजों तक सीमित! मौके पर निगरानी नाममात्र की—पूर्ण लापरवाही! 10 लाख की नाव जंग खाकर पड़ी सड़ रही!
सबसे बड़ा पर्दाफाश—नगरपालिका के पास 10 लाख की निगरानी बोट है, फिर पानी चोरी क्यों नहीं रुकती? रखरखाव की कमी से नाव जर्जर! इंजन फेल, बॉडी जंग लगी—सिर्फ खरीदारी का दिखावा! क्या यह नाव शहरवासियों को ठगने के लिए ही खरीदी गई?
*प्रशासन की मौन सहमति या जानबूझकर लापरवाही?*
ग्रामीण इलाकों में पानी रोकना पुरानी आदत है,शिकायतें गूंजती हैं, कार्रवाई के नाम पर नपा के जिम्मेदार 2-4 जल मोटर पकड़ लेते हे बाकी हालात वही शून्य ही नजर आते है ।
कर्मचारी केवल औपचारिकता निभाते हैं, ओर नदी किनारे के किसान किसान खुला खेल खेलते हैं।
*यह “मौन सहमति” शहर की प्यास का काल है!*
गर्मी में फिर प्रायवेट टैंकरों की पो बारह रहेगी।
ग्रीष्म में पार्वती बैराज ही शहर की उम्मीद। अगर अभी निगरानी न जुटाई गई, तो पुरानी कहानी दोहरेगी—टैंकर, कतारें, जलसंकट! नगरवासियों को पानी बचाने की नसीहत, लेकिन प्रशासन खुद जिम्मेदारी से भाग रहा?क्या 2 एमसीएम पानी पूरा आष्टा तक पहुंचेगा, या “सिस्टम” की भेंट चढ़ेगा? आष्टा के लोग त्रस्त—प्रशासन जागे, वरना गर्मी में आंसू बहेंगे!






