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आष्टा- निजी भूमि की आड़ में शासकीय जमीन का खुला कत्लेआम माइनिंग माफिया बेखौफ, प्रशासन मौन—कानून की कब्र पर चल रहा उत्खनन का खेल

निजी भूमि की आड़ में शासकीय जमीन का खुला कत्लेआम
माइनिंग माफिया बेखौफ, प्रशासन मौन—कानून की कब्र पर चल रहा उत्खनन का खेल
*दिनेश शर्मा आष्टा हलचल*

आष्टा
तहसील में अनेकों जगह निजी भूमि के छोटे-से टुकड़े को ढाल बनाकर बड़े पैमाने पर शासकीय जमीन का अवैध उत्खनन किया जा रहा है। यह कोई छुपा हुआ अपराध नहीं—दिनदहाड़े मशीनें गरज रही हैं, ट्रैक्टर-डंपर दौड़ रहे हैं, और खजाना लुट रहा है। सबसे चौंकाने वाली बात यह हे कि माइनिंग विभाग से लेकर स्थानीय प्रशासन तक मोन साधे बैठा है। ओर उत्खनन माफियाओं की पूरे क्षेत्र में पो बारह हे । ऐसा नहीं कि इस गोरख धंधे की जानकारीफील्ड अधिकारी कर्मचारी को नहीं हो ?, पर जिम्मेदारों का मोन ही हे कि उत्खनन माफियाओं के हौसले बुलंद हे । और बेस कीमती खनिज और मुरम का अवैध उत्खनन  बिंदास हो रहा हे ।आपको बता दे, संबंधित हल्के के जिम्मेदार पटवारी तक सब जानते हैं—फिर इस गोरख खेल में पटवारी की चुप्पी भी आश्चर्य चकित करती हे।
गौरतलब रहे ग्राम चीनोटा ग्राम में निजी जमीन के छोटे से टुकड़े की आड़ में अंधाधुंध मुरम का उत्खनन हो रहा हे । ग्राम चीनोठा में एक कंस्ट्रक्शन कंपनी द्वारा निजी जमीन के साथ साथ शासकीय बेस कीमती जमीन पर धड़ल्ले से उत्खनन किया जा रहा हे
बताया जा रहा हे एक निजी जमीन खसरा 536/2/3 के रकबा 0.234 हेक्टेयर में से मात्र 0.078 हेक्टर की उत्खनन हेतु स्वीकृति ली गई, जिसमें उत्खनन करता मात्र 25 .000 घन मीटर खनिज उत्खनित कर परिवहन कर सकता हे, ऐसा जारी आदेश से पता चल रहा हे, साथ ही जारी आदेश में स्पष्ट हे कि यह अनुमति सिंह आदेश जारी दिनांक से अगले दो माह की समय सीमा के लिए ही हे, किंतु उक्त चीनोटा ग्राम में निजी जमीन की आड़ में जिस तरह से शासकीय चरनोई भूमि पर बेखौफ होकर उत्खनन किया जा रहा हे, उससे तो लगता हे कि इस आदेश का इन माफियाओं के पास कोई मायने नहीं है। क्योंकि स्वीकृत जमीन क्षेत्र के साथ साथ एक बड़ा क्षेत्रफल सरकारी जमीन भी माफिया उत्खनन कर जहां भारी मुनाफा कमा रहा है वही सरकार को भारी राजस्व का चुना लग रहा हे ।

*काग़ज़ों की बाज़ीगरी, ज़मीन की लूट*

माफिया का तरीका सीधा है—निजी भूमि पर सीमित अनुमति दिखाओ, सीमारेखाएँ मिटाओ, और शासकीय जमीन को खुली खदान बना दो। मौके पर कोई सीमांकन नहीं, कोई बोर्ड नहीं, कोई निगरानी नहीं—सिर्फ़ सत्ता-तंत्र की सहमति की चुप्पी ही सब कुछ नजर आ रही है।
*कानून के रक्षक ही बने दर्शक*
खनन नियम कहते हैं— जमीन का अवश्य रूप से सीमांकन होकर मापन हो, साथ ही पर्यावरणीय शर्तों का पालन हो, यह अलग बात हे इस उत्खनन में परिवहन निगरानी भी अनिवार्य हे , क्योंकि ठेकेदार उत्खनित खनिज मिट्टी आदि चिन्हित स्थान पर ही परिवहन करेगा ।
पर ज़मीनी सच्चाई आज यह हे कि जिम्मेदारों का
निरीक्षण शून्य,
कार्रवाई शून्य, इतना ही नहीं खेल देखकर तो प्रतीत होता हे कि जिम्मेदारों ने भी अपनी
जवाबदेही शून्य ही कर रखी हे ।
जब पटवारी को जानकारी है, विभाग को भनक है, इसके बाद भी जिम्मेदार माइनिंग विभाग, स्थानीय प्रशासन आदि सभी मौन है , फिर इसे क्या कहेंगे? फिर तो यही कहा जाएगा कि यह लापरवाही नहीं, हे, बल्कि मिलीभगत का खुला खेल हे ।
प्रदर्शित खेल के यह संकेत नहीं तो और क्या हे ?
इन उत्खनन माफियाओं ने
पर्यावरण, राजस्व और भविष्य—तीनों पर जिस तरह से बेखौफ वार करते हुए
अवैध उत्खनन कर रहे हे उससे सरकारी राजस्व को भव बड़ा नुकसान हो रहा हे साथ ही
भूजल व पर्यावरण की अपूरणीय क्षति, भी हो रही हैं। इतना ही नहीं
ग्रामीणों की ज़मीन और आजीविका पर सीधा प्रहार होने के साथ साथ पशुओं की चरनोई भूमि भी खत्म हो रही हे । पर माफिया बेखौफ है—क्योंकि उसे पता है, आज नहीं तो कल फाइलें दब जाएँगी।
आज जिस तरह से यह अवैध उत्खनन का खेल चल रहा हे ।
जिस तरह से सरकारी जमीनों पर उत्खनन चल रहा हे, इसे देखकर बड़े सवाल उठते हे कि आखिर उत्खनन वाली भूमि का सीमांकन किसने किया? कब किया? रिकॉर्ड कहाँ है?
कितनी शासकीय भूमि खोदी गई—मापन रिपोर्ट क्यों नहीं?

मौके पर तैनात अधिकारी कौन—और उनकी जवाबदेही तय क्यों नहीं?
क्या बिना राजनीतिक/प्रशासनिक संरक्षण यह संभव था?
कार्रवाई नहीं तो यह ‘सहमति का अपराध’
यदि अब भी तत्काल रोक, मशीनों की जब्ती, भारी जुर्माना, एफआईआर और जिम्मेदार अधिकारियों पर निलंबन नहीं हुआ—तो यह साफ़ होगा कि यह उत्खनन प्रशासन की सहमति से चल रहा अपराध है।
जनता देख रही है। सवाल उठ रहे हैं।
अब या तो कानून बोले—या इतिहास लिखे कि शासकीय जमीन की लूट में रक्षक ही साझीदार थे।

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