*सरकारी संपदा पर माफियाओं का डाका? 10–12 हजार घनमीटर खनिज कहाँ गया?
क्या जिम्मेदार विभाग सिर्फ मशीन जप्त कर इतिश्री कर लेगा?*
*दिनेश शर्मा | आष्टा
हलचल*
आष्टा। शहर से लगे ग्रामीण अंचलों के जंगल क्या अब माफियाओं की निजी जागीर बनते जा रहे हैं? क्या सरकारी संपदा की खुली लूट पर जिम्मेदार विभाग सिर्फ दर्शक बना हुआ है? ये सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि ग्राम गोपालपुर के जंगल में अवैध उत्खनन का जो नजारा सामने आया है, वह किसी छोटे खेल की ओर इशारा नहीं करता।
बीते दिनों जिले से आई माइनिंग विभाग की टीम ने एक पोखलन मशीन और दो डंपर जप्त किए। कार्रवाई हुई, मशीनें पकड़ी गईं… लेकिन बड़ा सवाल अभी भी वहीं खड़ा है — आखिर कितना खनिज निकाला गया?
जिस स्थान पर उत्खनन हुआ, वहां बना विशाल गड्ढा साफ संकेत देता है कि यह मामूली खुदाई नहीं थी। स्थानीय आकलन के अनुसार करीब 10 से 12 हजार घनमीटर खनिज का दोहन किया गया हो सकता है।
यदि यह अनुमान सही निकला तो सरकार को लाखों रुपये के राजस्व का नुकसान हुआ होगा?
*निजी जमीन की आड़ या सुनियोजित खेल?*
सूत्रों की मानें तो गोपालपुर अकेला क्षेत्र नहीं है। निकट ग्राम चिन्नोठा की चरनोई भूमि पर भी महज 0.078 हेक्टेयर निजी जमीन की आड़ लेकर बड़े पैमाने पर उत्खनन किए जाने की चर्चा है।
क्या निजी भूमि का सीमित टुकड़ा दिखाकर आसपास की सरकारी या चरनोई भूमि से खनिज निकाला गया?
क्या विभाग ने सीमांकन और नाप-तोल की पूरी प्रक्रिया अपनाई?
सिर्फ जप्ती होगी या वाजिब राजस्व वसूली भी करेगा विभाग ?
माइनिंग विभाग ने मशीन और डंपर जप्त कर कार्रवाई तो की, लेकिन क्या यह पर्याप्त है?

क्या उत्खनित खनिज की सटीक माप होगी?
क्या बाजार मूल्य के अनुसार पेनल्टी और राजस्व वसूला जाएगा?
मशीन मालिक और असली संचालक तक कार्रवाई पहुँचेगी?
अगर सिर्फ औपचारिकता निभाई गई, तो क्या यह संदेश नहीं जाएगा कि “*पकड़े जाओ तो मशीन छुड़ा लो, खेल फिर शुरू”?*

*जांच में क्या होगा अगला कदम?*
विशेषज्ञों का कहना है कि अवैध उत्खनन के मामलों में:
स्थल का पुनः सीमांकन
उत्खनन की गहराई और क्षेत्रफल की माप
अनुमानित घनमीटर की गणना
बाजार दर से दंडात्मक वसूली
जरूरी प्रक्रिया होती है।
क्या यह सब होगा? या फाइलों में मामला सिमट जाएगा?
जिम्मेदार कौन?

यदि सही मायनों में सूक्ष्म जांच हुई तो बड़ा राजस्व सामने आ सकता है। लेकिन यदि मामला ठंडे बस्ते में गया, तो स्वाभाविक है कि जिम्मेदार विभाग भी शंका के घेरे में आएगा।
अब नजर इस बात पर है कि विभाग सख्त कार्रवाई करता है या सिर्फ दिखावे की खानापूर्ति?

अब देखना यह है कि सरकारी संपदा की हिफाजत होगी या माफियाओं की पो बारह जारी रहेगी? यह बात भी हम इसलिए कह रहे हे क्योंकि, जिले माइनिंग विभाग में बैठे अधिकारी न तो फोन उठा कर बात करते हे, ओर न ही स्वयं के स्तर से जानकारी देते हे । आज भी जिले में बैठे अधिकारी धर्मेंद्र चौहान को फोन लगा कर जानकारी लेना चाही पर उन्होंने फोन नहीं उठाया, आखिर फिर क्या समझा जावे?







