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प्रधान संपादक:- श्री दिनेश शर्मा
मुख्य संपादक:- श्री पीयूष शर्मा

*भूखे पेट किसान*, *पेटभरी जिम्मेदारी* — *मंडी में सत्ता का स्वाद ठप!* *आष्टा अनाज मंडी का हाल बड़ा अद्भुत है —*

*भूखे पेट किसान*,
*पेटभरी जिम्मेदारी* —
*मंडी में सत्ता का स्वाद ठप!*
*आष्टा अनाज मंडी का हाल बड़ा अद्भुत है —*

*दिनेश शर्मा आष्टा हलचल*

हम बात कर रहे हे आष्टा अनाज मंडी की यहां स्थानीय मंडी प्रशासन किसान हितैषी होने दावा तो रोजाना करता हे पर परिसर में बड़ी संख्या में आये किसान मजदूर की भूखा के प्रति संवेदनशील दिखाई नहीं देता ।
किसानों की फसलों का तौल तो रोज होता है, पर पेट का तौलना बंद हो चुका है। मुख्यमंत्री भोजन योजना का तंदूर ठंडा पड़ा है, जिम्मेदार अपने हठ के चूल्हे पर राजनीति की रोटियां सेंक रहे हैं।
सरकार की किसानों के लिए घोषित भोजन व्यवस्था अचानक बंद कर दी गई, जबकि नए टेंडर की आखिरी तारीख अभी 5 दिसंबर है। टेंडर पास होने में पखवाड़ा लगना तय है, लेकिन जिम्मेदारों को यह को समझावे की hungry किसानों की भूख कागज़ी प्रक्रिया नहीं भरती!

शासन की भावन्तर योजना चल यही हे,सोयाबीन की खरीदी जोर पर है, किसान दिनभर मंडी में डटे हैं, पर उन्हें शासन की मंशा अनुसार पांच रुपए की थाली भी नसीब नहीं है।

अब मंडी प्रांगण में वही पुराना मंजर — कोई ठेला, कोई तख्त, ओर उनका मनमाना रेट, न टेंडर, न नियम, बस पेट की मजबूरी और मंडी प्रशासन की “मौन सहमति”।कैंटीन एक साल से बंद पड़ी है, पर जिम्मेदारों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। शायद इन अधिकारियों के लिए किसान सिर्फ आंकड़ा है, इंसान नहीं। लाखों का राजस्व डूब रहा है, पर मंडी-महानुभावों की ज़मीन पर बेफ़िक्री का फसल लहलहा रही है।अब सवाल किसानों का नहीं, व्यवस्था के भूखेपन का है — पेट किसान का खाली है, पर जिम्मेदारी का पेट पूरी तरह भरा हुआ दिखता है। यही वजह हे कि कोई किसानों की सुध लेने को तैयार नहीं हे ।

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