*हम तो कहेंगे… यादों के वटवृक्ष की छांव अब राजनीति को रास नहीं आती!*
*दिनेश शर्मा/आष्टा हलचल*
*आष्टा की राजनीति में यदि कांग्रेस का इतिहास लिखा जाए तो उसकी पहली पंक्तियों में एक नाम पूरे सम्मान के साथ दर्ज होगा—भाईजी सेठ (स्व. फूलचंद जी कासलीवाल)*। *वह नाम जिसने संगठन को सींचा, कार्यकर्ताओं को जोड़ा और कांग्रेस को आष्टा में वटवृक्ष की तरह खड़ा किया*
एक दौर ऐसा भी था, जब प्रदेश कांग्रेस के दिग्गज नेता डॉ. शंकर दयाल शर्मा से लेकर उमराव सिंह जैसे अनेकों प्रदेश के दिग्गज वरिष्ठ नेता आष्टा आते थे तो स्थानीय राजनीति की नब्ज़ भाईजी सेठ से ही टटोला करते थे।
समय का चक्र घूमता है। व्यक्ति चला जाता है, लेकिन उसके योगदान की स्मृतियां जीवित रहती हैं। दुखद यह है कि इन्हीं भाईजी के परिवार में उनके ज्येष्ठ पुत्र स्वर्गीय अशोक जी कासलीवाल की धर्मपत्नी श्रीमती पद्मा जी कसलीवाल का आकस्मिक निधन हो गया, लेकिन संवेदनाओं की राजनीति शायद अब कैलेंडर और कार्यक्रमों में कहीं गुम हो गई।
बीते दो दिनों में आष्टा में कांग्रेस के दो बड़े चेहरे पहुंचे। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी आए, साइकिल चलाई, कार्यकर्ताओं से मिले, रात्रि विश्राम किया। अगले ही दिन पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के पुत्र अजय सिंह “राहुल भैया” भी आए, कार्यकर्ताओं को संबोधित किया और लौट गए।
सवाल यह नहीं कि वे आए या नहीं। सवाल यह है कि क्या किसी को उस परिवार की याद नहीं आई, जिसने वर्षों तक कांग्रेस की जड़ों को सींचा? क्या दो मिनट निकालकर शोक-संवेदना व्यक्त करना भी अब राजनीतिक कार्यक्रमों की सूची में शामिल नहीं रहा?
लगता है अब राजनीति में वटवृक्ष नहीं, केवल चुनावी पौधे बच गए हैं। जिनकी छांव में संगठन खड़ा हुआ, आज उन्हीं की चौखट तक पहुंचने का समय किसी के पास नहीं।
शायद अब त्याग, समर्पण और संगठन के पुराने अध्याय नई राजनीति की किताब से हटाए जा चुके हैं। अब केवल मंच, माइक, फोटो और सोशल मीडिया की सुर्खियां ही प्राथमिकता बनती जा रही हैं।
और फिर जब चुनाव परिणाम आते हैं तो सवाल पूछा जाता है—कांग्रेस लगातार पिछड़ क्यों रही है?
हम तो बस इतना ही कहेंगे…
जिस राजनीति में अपने ही वटवृक्षों की छांव भुला दी जाए, वहां संगठन की जड़ें कमजोर होना स्वाभाविक है। इतिहास को भूलने वाले वर्तमान तो बना लेते हैं, लेकिन भविष्य अक्सर उनसे रूठ जाता है।






